Friday, March 8, 2019

बिहार में एक और बालिका गृह कांड का डर क्यों है?: बीबीसी पड़ताल

यह सवाल इसलिए क्योंकि मई 2018 में समाज कल्याण विभाग के निदेशक को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ यानी टिस द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में बिहार के सभी 110 शेल्टर होम्स में से 104 की स्थिति ख़राब पाई गई थी. उनमें से 17 की हालत चिंताजनक थी. मुज़फ़्फ़रपुर का बालिका गृह उन्हीं 17 में से एक था.

जहां तक TISS की रिपोर्ट पर सरकार की गंभीरता का सवाल है तो वह मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड के मामले में सरकार की भूमिका से ही स्पष्ट हो जाता है. और सरकार की भूमिका तब सवालों के घेरे में आ जाती है जब हम यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि आख़िर मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड हुआ क्यों?

क्योंकि, जिस मामले को TISS की टीम ने 9 नवंबर 2017 को बालिका गृह में आधा घंटा बिताकर ही समझ लिया था और उसका ज़िक्र अपनी रिपोर्ट में किया था, सरकार और सिस्टम मिलकर सालों तक उसे समझ नहीं पाए. जबकि समाज कल्याण विभाग, बाल संरक्षण आयोग, महिला आयोग के अधिकारी नियमित रूप से जांच के लिए बालिका गृह जाते रहे थे.

इससे एक बात तो साफ़ है मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड कभी नहीं होता अगर सरकार और सिस्टम के लोग जो नियमित रूप से जांच अथवा निरीक्षण के लिए बालिका गृह जाते रहे थे, अपना काम बख़ूबी ईमानदारी के साथ करते.

बालिका गृह के रिमार्क्स रजिस्टर में वहां सभी आने-जाने वालों के नाम दर्ज थे और उनके रिमार्क्स भी. बालिका गृह की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान कर्मियों ने बताया था कि जितने भी मंत्री, नेता, अधिकारी बालिकागृह आए सभी के रिमार्क्स उस रजिस्टर में दर्ज हैं. मुज़फ़्फ़रपुर पुलिस के मुताबिक़ अब उस रजिस्टर को सीबीआई ने ज़ब्त कर लिया है.

अगर सरकार गंभीर होती तो ज़रूर उन लोगों से सवाल किया जाता कि आख़िर उनके निरीक्षण में कभी ऐसी बात सामने क्यों नहीं आई जो TISS के लोगों ने आधे घंटे में उजागर कर दिया था. सीबीआई की चार्जशीट में उस रिमार्क्स रजिस्टर को आधार बनाया गया है कि नहीं, मालूम नहीं. लेकिन अगर आधार बनाया जाएगा तो मामला उन सभी के ख़िलाफ़ बनेगा जो बालिका गृह आकर सब देख जाने के बाद भी अच्छे रिमार्क्स लगाकर गए थे. इन लोगों में बिहार सरकार के कई मंत्री, नेता और अफ़सर शामिल हैं.

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह मामले की आगे की जांच भी सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़े करती है. हाल के दिनों में इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिलता है मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह की पीड़ित लड़कियों के रखरखाव और देखभाल में प्रबंधन की चूक का.

मुज़फ़्फ़रपुर की पीड़ित लड़कियों को जिन्हें मधुबनी और मोकामा के शेल्टर होम्स में भेजा गया था, वहां से कई दफे़ लड़कियां लापता हुईं. 12 जुलाई को मधुबनी से लापता एक लड़की जो मामले की गवाह भी थी, उसका आज तक कोई पता नहीं लग सका है.

हाल ही में मोकामा के शेल्टर होम से भी मुज़फ़्फ़रपुर की चार लड़कियाँ लापता हुईं थीं, जो मामले की गवाह और पीड़िता दोनो थीं. पुलिस ने दावा किया है कि उसने सभी लड़कियों को बरामद कर लिया है. लेकिन इसपर अभी सवाल है! क्योंकि मधुबनी से लापता लड़की का जो पुलिस महीनों बाद तक कोई पता नहीं लगा सकी है, उसने दो दिनों के अदंर मोकामा से लापता सभी सातों लड़कियों को सकुशल बरामद कर लिया.

मुज़फ़्फ़रपुर के अलावा भी पटना, मोतिहारी और सीतामढ़ी के दूसरे शेल्टर होम्स से लड़कियां, महिलाएं और बच्चे रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हुए हैं. इनका ज़िक्र न सिर्फ़ TISS की रिपोर्ट में था, बल्कि मुज़फ़्फ़रपुर कांड के उजागर होने के बाद इन शेल्टर होम्स की कुव्यवस्था और कुप्रबंधन की ख़बरें भी सुर्ख़ियों में शामिल हुई थी.

दरअसल, आज तक यही सवाल कभी सुर्ख़ी नहीं बन पाया है कि बिहार के शेल्टर होम्स में ऐसे कांड हो क्यों रहे हैं?

यदि हम मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड और पटना शेल्टर होम के मनीष दयाल कांड को ग़ौर से देखें तो पाएंगे कि दोनों शेल्टर होमों को नियम और शर्तें नहीं पालन करने के बावजूद भी चलाने का ठेका दिया गया. जिन लोगों और संस्थाओं को शेल्टर होम चलाने को मिले उन्हें और भी तमाम तरह के (एड्स कंट्रोल, महिला पुनर्वास, वगैरह) ठेके सरकार द्वारा दिए गए.

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह मामले में हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले संतोष कुमार कहते हैं कि, "यह एक सिंडिकेट की तरह लगता है. इसीलिए इसपर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. ब्रजेश को तीन अख़बार चलाने का लाइसेंस जिस आईपीआरडी विभाग ने दिया था, उसका प्रभार जब से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, तभी से उन्हीं के पास है. मनीषा दयाल के एनजीओ को विभाग ने सबसे ज़रूरी नियम को ताक पर रखकर केवल दो सालों में शेल्टर होम चलाने का टेंडर दे दिया. लेकिन इन ग़लतियों के लिए किसी को ज़िम्मेदार तक नहीं ठहराया गया. बल्कि और संरक्षण दिया गया."

'मुज़फ़्फ़रपुर कांड पर उबल क्यों नहीं पड़ता देश'

संतोष कहते हैं, "मुज़फ़्फ़रपुर कांड के बाद भी यह सिंडिकेट प्रोटेक्शन सिस्टम नहीं बदला है. अभी भी उन एनजीओ को शेल्टर होम्स को ठेके पर चलाने को दिया जा रहा, जिनके शेल्टर होम पर TISS की रिपोर्ट में सवाल उठाए गए थे. जबकि मुज़फ़्फ़रपुर कांड के बाद नीतीश कुमार ने ये बयान दिया था कि सरकार सभी शेल्टर होम्स को अपने नियंत्रण में लेगी."

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