सोमवार को जब कांग्रेस के तीन मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने सूबे की शपथ ली, तब कुछ दक्षिणपंथी रुझान वाले फ़ेसबुक पेज और ग्रुप एक लेख शेयर कर रहे थे.
उनका दावा था कि अमरीकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव की विवेचना कर मुख्य कारणों की एक फ़ेहरिस्त तैयार की है कि आख़िर भारतीय जनता पार्टी और मोदी खेमे को इन चुनावों में हार का सामना क्यों करना पड़ा.
शेयर किए जा रहे आर्टिकल के अनुसार न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारतीय वोटर्स के पैटर्न को समझाने की कोशिश की है और बताया है कि मौजूदा मोदी सरकार को इन नतीजों से क्या सबक लेने चाहिए.
ये 'आर्टिकल' तस्वीर और टेक्स्ट के तौर पर अंग्रेज़ी समेत हिन्दी में भी पोस्ट किया गया है. साथ ही इसे व्हॉट्सऐप पर भी शेयर किया जा रहा है.
कुछ लोगों ने इस आर्टिकल का लब्बोलुआब लिखा है कि 'भारतीय वोटर बेहद संकीर्ण मानसिकता के हैं जो हमेशा शिक़ायत करते रहते हैं. साथ ही उन्हें अपनी समस्याओं के हल तुरंत चाहिए, वो लंबी योजनाओं में विश्वास नहीं करते.'
इस लेख की सच्चाई
अपनी पड़ताल में हमने पाया कि लेख बताकर शेयर की जा रही ये पोस्ट फ़र्ज़ी है.
फ़ेसबुक सर्च से पता चलता है कि 11 दिसंबर के बाद से इस पोस्ट को न्यूयॉर्क टाइम्स का आर्टिकल बताकर शेयर किया जा रहा है.
लेकिन 'नरेंद्र मोदी' और 'विधानसभा चुनाव 2018' जैसे की-वर्ड्स से सर्च करने पर ये साफ़ हो जाता है कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने ऐसा कोई आर्टिकल नहीं लिखा है जिसमें विधानसभा चुनावों की विवेचना कर भाजपा की हार के कारण बताए गए हों और भारतीय लोगों के लिए ऐसी भाषा में तो कोई लेख अमरीकी साइट पर क़तई नहीं लिखा गया है.
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसका मज़ाक भी बनाया है. लेकिन भाषाई स्टाइल अमरीकी अख़बार की स्टाइल शीट से बिल्कुल मेल नहीं खाता.
दिलचस्प है कि ये कथित लेख भाजपा की हार के लिए जनता को ही दोषी ठहराता है. जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने भी पाँचों राज्यों में चुनावी जनादेश का आगे बढ़कर स्वीकार किया है.
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